प्राणजीवन के नेह में तन मन से रहे चूर

Rasik Pachchisi — श्री रूप माधुरी

Verse 4 of 6

रसिक छके युग नेह में, सब से बेपरवाह। रूप माधुरी मस्त है, तजी जगत की चाह॥ - श्री रूप माधुरी, श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (3) रसिक छके युग नेह पुरुष, हर बात से बेपरवाह। रूप माधुरी महान है, वह इस संसार की अभिलाषा है... - श्री रूप माधुरी, श्री रूप माधुरी जी की आवाज, रसिक पचीसी (3)
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