प्राणजीवन के नेह में तन मन से रहे चूर
Rasik Pachchisi — श्री रूप माधुरी
Verse 5 of 6
रसिक रसिक सब कोऊ कहै, कठिन रसिकता रीत।
बाहिर दर्शे दीनता, अंतर में विपरीत॥
- श्री रूप माधुरी, श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (13)
सब कुछ अच्छा है, लेकिन स्वाद कठिन है। बाह्य रूप से दृश्यमान, आंतरिक रूप से मानव विपरीत.. - श्री रूप माधुरी, श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पचीसी (13)