लटकत आावत बाहाँ जोरी
Samay Prabandha — श्री अलबेली अलि
Verse 12 of 19
निरखि निरखि अलि रूप लुभानी।
नाहिं तृप्ति पीवत अति आतुर, नयन निमेष भुलानी॥ [1]
हँसि हँसि सिथिल दुकूल संवारत, हिलगि हियें सरसानी।
अलबेली सु रसिक रसलोभी, रस बतियन बतरानी॥ [2]
- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (59)
निरखी निरखी अली का रूप मनमोहक है. नहिं तृप्ति पिवत अति आतुर, नयन निमेष भुलानि।।[1] हँसी, शांति, विश्राम, हिल्गी हिय सरसानि। अलबेली सु रसिक रसलोभी, रस बतियाँ बतरनी.. [2] - श्री अलबेली अली, समय प्रबंधन (59)