लटकत आावत बाहाँ जोरी
Samay Prabandha — श्री अलबेली अलि
Verse 4 of 19
भोरहिं उठि अलिरूप विचारूं।
अद्भुत नवलकिसोर माधुरी, रूप अनूप निहारूँ॥ [1]
करि असनान उबटि अंग अंगनि नाना भाँति सिंगारूँ।
भूषन वसन प्रसादी स्वामिनि पुलकि पुलकि उर धारूं॥ [2]
सदा रहूं ललितादिक संगी प्रेम भरी अनुहारूँ।
'अलबेली' श्री वंशी अलि बलि, महल टहल अनुसारूँ॥ [3]
- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (20)
मैं सुबह जल्दी उठा और अलीरूपा के बारे में सोचा। अद्भुत नवलकिशोर माधुरी, देखो न्यारी.. [1] अनेक प्रकार से मैं अपना और अपने शरीर का श्रृंगार करती हूँ। भूषण वसन प्रसादि स्वामिनी पुलकि पुलकि उर धारुम।।[2] मैं हमेशा प्यार और भारी चेहरे के साथ ललितादिक के साथ रहूं।' 'अलबेली' श्री वंशी अली बाली, महल तहल अनुश्रुण.. [3] - श्री अलबेली अली, समय प्रबंधन (20)