ए दोउ राजत रंग भरे री

Samay Prabandha — श्री अलबेली अलि

Verse 5 of 19

(राग पूरबी) ए दोउ राजत रंग भरे री। भुज जोरें सांवल तन गोरें, गहि द्रुम डारि खरे री॥ [1] पुलकत अंग अनंग छके छवि, बातन रंग ढेरे री। पान भरे मुख सुख सरसाने, अरुझाने दृग पल विसरे री॥ [2] नवल छैल चितवत प्रीतम तन, हँसि हँसि प्रान हरे री। अलबेली अलि रूप तरंगनि, नैना मीन परे री॥ [3] - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (166) (राग पूरबी) ऐ दू रजत रंग भरे री। भुज जोरे संवल तन गोरे, गह द्रुम डारि खरे री.. [1] पुलकट अंग अंग छके छवि, बातन रंग ढेरे री। मुख में खुशी थी, पल में उत्साह फैल रहा था.. [2] नवल छैल चितावत प्रीतम तन, हांसी हांसी प्राण हरे री। अलबेली अली रूप तरंगानी, नैना मिन पारे री.. [3] - श्री अलबेली अली, समय प्रबंधन (166)
लटकत आावत बाहाँ जोरीलटकत आावत बाहाँ जोरी