नामी नाम न भावई
Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव
Verse 11 of 102
बिछुरन मिलन जहाँ रहै, सुद्ध प्रेम नहिं होइ।
मिलत मिलत बढ़ै चाह अति, सुद्ध प्रेम है सोंइ॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (231)
जहां अलगाव और मिलन है, वहां शुद्ध प्रेम नहीं है। मिलत मिलत बधाई हो, ढेर सारा प्यार, शुद्ध प्रेम सोनी.. - श्री ललित किशोरी देव, आवाज श्री ललित किशोरी देव जू, सिद्धांत की सखी (231)