नामी नाम न भावई

Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव

Verse 14 of 102

चरन कमल रज सेइयौं, मन वच क्रम यह आस। अपनों सरवस जानिकेँ, बलि जाय नागरीदास॥ - श्री नागरी देव जी, श्री नागरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (01) चरण कमल रज सेयौ, मन वाच क्रम यः। अपाणो सर्वस जानिकेन, बाली जय नागरीदास.. - श्री नागरी देव जी, श्री नागरी देव जी की वाणी, सिद्धांत के साथी (01)
नामी नाम न भावईचतुरदास चित चौंप सों, करि वृंन्दावन बास।