नामी नाम न भावई

Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव

Verse 20 of 102

जा मारग मेरौ गुरु चलयौ, ता मारग हौं जाऊँ। और जिते मारग सबै, तिन्हैं न हौं पतिआऊँ॥ - श्री ललितकिशोरी देव, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (557) मरो मेरे मालिक, मैं मर जाऊँगा। और राह तो सभी जीते हैं, मैं अकेला पति नहीं हूं.. - श्री ललित किशोरी देव, आवाज श्री ललित किशोरी देव जू, सिद्धांत की सखी (557)
नामी नाम न भावईजा सुख नैना सुख ढके, सो सुख कह्यो न जाइ।