जब प्रिया मानैं अपनपौ, तब लाल रहें आधीन।

Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव

Verse 23 of 102

जब प्रिया मानैं अपनपौ, तब लाल रहें आधीन। मन इच्छित सुख कौं लहे, छिन छिन प्रीति नवीन॥ - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत की साखी (152) प्रिया को लगता है कि उसका बेटा और लाल उसके नियंत्रण में है। दिल को जो खुशी चाहिए वह कौन ला सकता है, नया प्यार छीन सकता है... - श्री ललित किशोरी देव, स्वर श्री ललित किशोरी देव जू, सिद्धांत साखी (152)
जब जागै तब प्रिया भजे, कै सोवै पांव पसारि।नामी नाम न भावई