नामी नाम न भावई
Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव
Verse 26 of 102
कोई कहै बैकुंठ, कोई कहै ब्रह्म है।
कोई कहै इह राम, कोई कहै कृष्ण है॥ [1]
कोई कहै यह कुंजनि-कुंजनि, रास कियौ निरधार है।
हरि हाँ, सबै तजौ जंजाल, भजौ हरिदास कह्यौ सुखसार है॥ [2]
- श्री ललितकिशोरी देव, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (346)
कोई कहता है वैकुण्ठ है, कोई कहता है ब्रह्मा है। कोई कहता है राम है, कोई कहता है कृष्ण है.. [1] कोई कहता है ये कुंजनि-कुंजनी, रस कियौ निराधार है। हरि हं सबि तजो जंजाल, भजौ हरिदास कह्यौ सुखसार है। [2] - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की आवाज, सिद्धांत की साखी (346)