नामी नाम न भावई

Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव

Verse 27 of 102

कोटि भजन एकादसी, कोटि तीर्थ अस्नान। दुखवै काहू संत कौं, (तौ) हरि नहिं करैं प्रमान॥ - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (237) कोटि भजन एकादशी, कोटि तीरथ आसन। दुःखी संत कौन कहे, (ताऊ) हरि सिद्ध न कर सके.. - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत साखी (237)
नामी नाम न भावईकुंज बिहारीनि बाल कों, सेवें हित सों नित्त।