नामी नाम न भावई
Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव
Verse 36 of 102
नहिं चाहों बैकुंठ नहिं चहौं ब्रह्मानंद कौं।
नहिं चाहों, वे राम नहीं आनंद नंद कौं॥ [1]
नहिं चाहों कुंजनि कुंजनि रास बिलास लौं।
हरि हाँ, श्री हरिदास कह्यौं सोई गहूँ यहो विस्वास लौं॥ [2]
- श्री ललितकिशोरी देव, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (347)
न मुझे वैकुण्ठ चाहिए, न मुझे ब्रह्मानन्द चाहिए। नहीं चाहिए, वह राम नहीं है, जो आनंद नंद है.. [1] नहीं चाहिए, कुंजनि कुंजनि रस बिलास लौं। हरि हन, श्री हरिदास कह्यौं सोइ गहौं यो विश्वास लौं.. [2] - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत की साखी (347)