नामी नाम न भावई
Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव
Verse 37 of 102
नैना निरखैं रूप कों, जीभ लेत निज नाम।
अंगन सों श्री अंग मिलि, पायो मन बिश्राम॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (267)
जुबान आँखों के मासूम रूप का नाम लेती है. आंगन पुत्र श्री अंग मिलि, पायो मन विश्राम.. - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत की साखी (267)