निहचै भजै बिहार कों, और न जानैं देव।

Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव

Verse 38 of 102

निहचै भजै बिहार कों, और न जानैं देव। तन मन अर्पन रसिक कों, निर्भय ह्वै करि सेव॥ - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत की साखी (290) मैं नहीं जानता कि बिहार की पूजा कौन करता है, और मैं भगवान को नहीं जानता। जो शरीर और मन से भक्त है, जो निर्भय है और जो सेवा करता है... - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की आवाज, सिद्धांत की सखी (290)
नामी नाम न भावईनिजु प्रिय कीनी अपनपौ, तन मन रही समाई।