निजु प्रिय कीनी अपनपौ, तन मन रही समाई।

Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव

Verse 39 of 102

निजु प्रिय कीनी अपनपौ, तन मन रही समाई। तू मेरी है प्राण सखी, पोषत मन के भाई॥ - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत की साखी (284) निजु प्रिय किनि अपनपौ, तन मन रहे समाई। तुम मेरे जीवन के सखा, मेरे मन के प्रिय भाई.. - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांतों के सखा (284)
निहचै भजै बिहार कों, और न जानैं देव। निश्चय तन मन प्रेम सों, सुमिरि बिहारिनि बाल।