नामी नाम न भावई

Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव

Verse 4 of 102

अनंत जनम की भूलि कौं, छिन में डारैं खोई। श्री कुंज बिहारिनि लाडिली, तुम ते सब कछु होई॥ - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (150) जो व्यक्ति अपने पिछले जीवन को भूल गया है, उसने अपना भाग्य जल्दबाजी में खो दिया है। श्री कुंज बिहारिणी लाडिली, तुम ते सब कछू होई.. - श्री ललित किशोरी देव, स्वर श्री ललित किशोरी देव जू, सिद्धांत की सखी (150)
अलकैं छूटीं वदन पर, श्रम जल कन अभिराम।नामी नाम न भावई