नामी नाम न भावई

Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव

Verse 51 of 102

सदा बसै वृन्दाबिपिन, तजे न कबहूँ खेत। लाड लडावै जुगल वर, लियें प्रिया कौ हेत॥ - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (412) वृंदाबिपिन सदा वास, खेत कबहुं न ताजा॥ लड़ो, झगड़ो, वर का इंतजाम करो, किसका प्यार लो.. - श्री ललित किशोरी देव, स्वर श्री ललित किशोरी देव जू, सिद्धांत की सखी (412)
रोम रोम आनंद भयो, छिनु छिनु होत हुलास। नामी नाम न भावई