सहज स्नेही श्याम के, बन बसि अनत न जाँइ।
Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव
Verse 53 of 102
सहज स्नेही श्याम के, बन बसि अनत न जाँइ।
ते राँचे सारे देश सौं, जहाँ तहाँ ललचाँइ॥
- श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत की साखी (294)
श्याम की स्वाभाविक प्रेमिका, वह कभी अंत नहीं जानती थी। पूरा देश दौड़ रहा है, जहां उत्साह है.. - श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की आवाज, सिद्धांत के मित्र (294)