नामी नाम न भावई

Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव

Verse 6 of 102

अनहाये कबहूँ नहीं, न्हाये रहत सु नित्त। सुद्ध करें सब सुद्ध कौं, कुंजबिहारिन मित्त॥ - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (302) न जाने कब बेबस हो जाता हूँ, नहाता रहता हूँ। जो सबको पावन करती है, मिट जाती है कुंजबिहारिनें.. - श्री ललित किशोरी देव, स्वर श्री ललित किशोरी देव जू, सिद्धांत सखी (302)
नामी नाम न भावईबैकुंठ महा बैकुंठ तै, गोलोक परै है धाम।