सो सुख वृन्दाविपिन है, मूल आदिद्रुम जैस।

Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव

Verse 68 of 102

सो सुख वृन्दाविपिन है, मूल आदिद्रुम जैस। ललितादिक निरखैं चतुर, जुगल नवल सम वैस॥ - श्री चतुर दास जी, श्री चतुर दास जी की वाणी, सिद्धांत की साखी (6) तो सुख वृंदाविपिन है, मूल आदिद्रम के समान है। ललितादिक निराखैं चतुर, जुगल नवल सम वैस.. - सिद्धांत श्री चतुर दास जी के मित्र श्री चतुर दास जी के वचन (6)
श्रुति स्मृति बिचारत तत्व सब, पार न पावे कोई। सोई जगत में जानि, जाकौं मैं मेरी लगी।