श्री हरिदास अनन्य जै, वर विहार-रस केलि
Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव
Verse 78 of 102
भजन न कीनों मैं कछू, जानत नाहिन जोग।
श्री स्वामी की कृपा बल, सहज संयोगी भोग॥
- श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (91)
मुझे नहीं पता कि कौन सा भजन कहूं, मुझे नहीं पता। श्री स्वामी की कृपा, शक्ति, सहज स्नोयोगी आनंद... - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहे (91)