श्री हरिदास अनन्य जै, वर विहार-रस केलि
Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव
Verse 79 of 102
चरण कमल चित लाई कै, गाऊँ गुन सुख-रासि।
आनंद-निधि कृपाल नित्य, पाऊँ प्रेम प्रकासि॥
- श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (52)
चरण कमल चमक रहे हैं, ध्वनि शुष्क और मधुर है। आनंद-निधि कृपाल नित्य, पौन प्रेम प्रकाशी.. - श्री रूप सखी के दोहे, सिद्धांत (52)