श्री हरिदास अनन्य जै, वर विहार-रस केलि

Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव

Verse 85 of 102

रतन खचित भुव जगमगति, लसति तमालनि बेलि। श्री स्वामी हरिदास कै, निभृत निकुंजन केलि॥ - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (43) रटन खचित भुव जगमगति, लसति तमलनि बेलि। श्री स्वामी हरिदास काई, निभृत निकुंजन केलि.. - श्री रूप साखी, सिद्धांत के दोहे (43)
श्री हरिदास अनन्य जै, वर विहार-रस केलिसाखी के दोहे, सिद्धांत (22) श्रीधाम वृन्दावन की दिव्य भूमि ब