श्री हरिदास अनन्य जै, वर विहार-रस केलि
Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव
Verse 87 of 102
रतन-खचित वृदाविपुन, भूमि लता-द्रुम रंग।
श्री स्वामी के लाडिले, रचे सुकेलि अनंग॥
- श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (22)
वृदाविपुन रतन पहने हुए, लताओं और डमरूओं से भरी हुई भूमि। श्री स्वामी की प्यारी, राचे सुकेली अंग.. - श्री रूप सखी के दोहे, सिद्धांत (22)