श्री हरिदास अनन्य जै, वर विहार-रस केलि

Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव

Verse 90 of 102

श्री हरिदास अनूप अलि, रसिक रूप बलिहार। अनमिष इकटक निरषिहीं, निरवधि नित्य-विहार॥ - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (47) श्री हरिदास अनूप अली, त्याग का रूमानी रूप। अनामिष इतक नासिहिहिं, निर्वधि नित्य-विहार.. - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहे (47)
श्री हरिदास अनन्य जै, वर विहार-रस केलिश्री हरिदास अनन्य जै, वर विहार-रस केलि