श्री हरिदास अनन्य जै, वर विहार-रस केलि
Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव
Verse 95 of 102
श्री वृंदावन बास वर, दियो न अनतहि जांउ।
रसिक सिरोमनि की कृपा, नित्यबिहारहि गांउ॥
- श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (73)
श्री वृन्दावन, कृपया इसे अजन्मे बच्चे को दें। रसिक सिरोमनि कृपा, नित्यबिहारहि गणु.. - श्री रूप सखी सिद्धांत के दोहे (73)