जै जै बिपिन बिहारी जू।
Siddhanta Pada —
Verse 17 of 63
जै जै बिपिन बिहारी जू।
तन मन बिलसत अति सुखरासी रोम रोम हितकारी जू॥ [1]
अति आनंद भरी रसमाती छिन हूँ होति न न्यारी जू।
श्रीललितकिसोरी की निजु जीवनि कुंजबिहारिनि प्यारी जू॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (62)
जय जय बिपिन बिहारी जू। शरीर और मन के लिए विलासिता से भरपूर, हर त्वचा के लिए अत्यंत सुखदायक और लाभकारी.. [1] अत्यंत आनंददायक, आनंद से भरपूर, बेजोड़। श्री ललित किशोरी कुंजबिहारिणी प्यारी जू की व्यक्तिगत जीवनी.. [2] - श्री ललित किशोरी देव, शब्द, श्री ललित किशोरी देव जू के सिद्धांत (62)