बिहारी जू है तुम लौ मेरी दौर

Siddhanta Pada —

Verse 18 of 63

(राग सोरठ) जै श्रीहरिदास रसिक वर की। परम अनन्य सुधरम बतायौ, करमनि की छाती धरकी॥ [1] नित्यविहार निरंतर निरखैं, जहाँ नहीं गम विधि-हरकी। रूप-रंग रस-जस कल गावैं, तिनुका लौं माया तरकी॥ [2] - श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (36) (राग सोरठा) जय श्री हरिदास रसिक वर की। हमें उस अनूठे सुधारम के बारे में बताएं जिसने करमानी की सुरक्षा ली थी। [1] चिंता रहित दैनिक जीवन, जहाँ कोई दुःख और कोई हार नहीं। रूप, रंग, स्वाद - ज्यों कल खोई, तिनुका लौं माया तारकि.. [2] - श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी के वचन, सिद्धांत के छंद (36)
जै जै बिपिन बिहारी जू।जे श्रीराधा चरन उपासी