दोऊ राजत स्यामा स्याम

Siddhanta Pada —

Verse 20 of 63

(राग देवगंधार) जिहिं जिहिं अंगनि दृष्टि परतहो लडैती, तहाँ तहाँ अटकि रहत मन मेरो। तेरी सौंहन खाऊँ लाखन, हों तो तेरो चेरौं॥ [1] तेरी ये आस बिहार करत नित, तुम उपजीव हेरों। रसिकन श्री ललिता सखी कृपाते, मो हिय सेबन तेरो॥ [2] - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (35) (राग देवगंधार) जहाँ भी मेरी आँखें मुझे देखती हैं, मेरा मन वहीं अटक जाता है। कहाँ है तेरा प्यार डार्लिंग, अगर मैं तेरा आशिक हूँ... [1] मैं तो हर दिन तेरे साथ ऐसा करता हूँ, तू एक उर्वर बगुला है। रसिकन श्री ललिता सखी कृपाते, मो हिय सेबन तेरो.. [2] - श्री वंशी अली, सिद्धांत के छंद (35)
जे श्रीराधा चरन उपासीजिकरि फ़िकरि सब छाँड़ि कै, ललित केली गुन गाव।