पौंढे माई लालन गिरिवरधारी

Siddhanta Pada —

Verse 23 of 63

(राग विहागरो) करि मन रसिकनी सौं सत्संग। सुकृत सुहृदय भजन मैं भीजै उपजावैं निजु रंग॥ [1] महा माधुरी ललित सलोचन निरखत वदन दुरंग। रूप बसंत इनके उर नित्य ही जुगल सरूप अभंग॥ [2] - श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (72) (राग विहगरो) कारि मन रसिकानि सौं सत्संग। सुकृत सुहृदय भजन मैं भीजै उपजवैं निजु रंग।।[1] महामाधुरी ललित सलोचन निरखत वदन दुरुंग। रूप बसंत इनके उर नित्य ही जुगल सरूप अभंग.. [2] - श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी के वचन, सिद्धांत (72)
कहा त्रिलोकी जस किये, कहा त्रिलोकी दान।कर्म धर्म और ज्ञान विज्ञान भक्ति न आन हृदै में आनौं।