(सवैया)

Siddhanta Pada —

Verse 4 of 63

(सवैया) बखानत प्रेम प्रताप महातम साँच न स्वाँग कसै कसि काँची। [1] साधिक सिद्ध भयो तो कहा कुंवरि किशोरी कृपा नहिं जाँची॥ [2] श्रीगुरु प्रेम प्रसन्न बिहारनिदासि श्रीनागरी के रंग राची। [3] रे बुद्धि बिवेक बिचारि इहै जु कहै सु लहै तो करै सब साँची॥ [4] - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (28) (सवैया) बखानत प्रेम प्रताप महातम सांच न स्वांग कसाई काची कांची। [1] जब साधक सफल हो जाता है तो कुंवारी कन्या की कृपा की परीक्षा नहीं होती.. [2] बिहार निवासी श्री गुरु प्रेम प्रसन्ना ने श्रीनगरी रंग रचाया। [3] हे तुच्छ बुद्धि और विवेक, जो कहा गया है उसे सुनो और फिर सब कुछ करो सांची.. [4] - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी के वचन, सिद्धांतों के सिद्धांत (28)
बैठत उठत चलत, श्रीकुंजबिहारी की जिकरि।आज सखि निरख रूप भरि नैन