साधो भाई ऐसौ महल हमारौ।

Siddhanta Pada —

Verse 49 of 63

साधो भाई ऐसौ महल हमारौ। निर्गुण सगुण वारि है जाकी कहत न वेद विचारौ॥ [1] अद्भुत प्रेम रंग रस अद्भुत अद्भुत नित्य बिहारौ। ललित प्रिये सुख रासि रसिकवर करि राख्यौ उरहारौ॥ [2] - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (101) साधो भाई, यह महल हमारा है। वेद कहते हैं कि निर्गुण और सगुण भिन्न-भिन्न हैं। [1] अद्भुत प्रेम, रंग और रस, अद्भुत अद्भुत नित आनंद। ललित प्रिय, खुश रहो. [2] - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू (101) के वचन, सिद्धांत
सब ही संत हैं रस भरे, सब ही रस की खानि।साधु साधु सब एक हैं, ठाकुर ठाकुर एक।