सहचरि करै सोइ मोइ भावै, सहचरि मो मन ढारि ढरत है।

Siddhanta Pada —

Verse 51 of 63

सहचरि करै सोइ मोइ भावै, सहचरि मो मन ढारि ढरत है। मोपर ललिता नैंन पुतरिन, मो दृग ललिता रूप धरत है॥ [1] मो तन-मन ते सजनी प्यारी, वह जीवनि न्योछारि करत है। जैश्री वंशीअलि ह्वै मर्म कौन करि, हँसी जुगल जल लहरि ढरत है॥ [2] - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (28) मेरा साथी मुझे सुलाता है, मेरा साथी मेरा दिल और आत्मा है। मोपर ललिता नैनन की बेटी है, मो द्रिग ललिता पृथ्वी का रूप है.. [1] मो तन मन की प्यारी है, प्राण त्यागती है. जयश्री वंशीयलि ह्वै मर्म कौन कारी, हंसी जुगल जल लहरी धरत है.. [2] - श्री वंशीय अली, सिद्धांत के सिद्धांत (28)
साधु साधु सब एक हैं, ठाकुर ठाकुर एक।सखी लालन को पयोष, प्रिया-पद-रस प्याइ।