आज सखि निरख रूप भरि नैन

Siddhanta Pada —

Verse 53 of 63

(राग विहागरौ) सखी री मन के स्याम सुखदाई। प्रगट स्याम सों कौन मिलै अब बिछुरै होत दुखदाई॥ [1] निसि-दिन पलक एक नहिं छोडत पोसत मन के भाय। अंतरगत बिहरत जु दुराने भेंटत कंठ लगाई॥ [2] सोवत जागत संग ही डोलत जितहीं तित मन जाई। इन्हैं उन्हैं यह भेद कहा है मदन तेज अधिकाई॥ [3] विरह दुख होत नहिं जातें ये चतुरन के राई। श्रीरसिकबिहारी सो कहत बिहारिनि मिलिये बोल हराई॥ [4] - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (4) (राग विहागरौ) सखी री मन के स्याम सुखदाई। प्रगट श्यामा मिलोगे तो, अब बिछुड़ना दुःख होगा। [1] प्रति दिन भय मन में, एक भी पलक न छूटे। बिहार के भीतर, मैं अपने दिल में गाऊंगा.. [2] मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं दुनिया के साथ चल रहा हूं। मदन तेज अधिकारी ने उन्हें यह रहस्य बताया है.. [3] विरह दुःख व्यक्त नहीं करता, ज्ञान की किरण है। यही कहते हैं श्री रसिक बिहारी, बिहारिणी मिलो हाँ कहो.. [4] - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी के वचन, सिद्धांत (4)
सखी लालन को पयोष, प्रिया-पद-रस प्याइ। श्री बिशोक नंदिनी बिनु कौहै।