श्री बिशोक नंदिनी बिनु कौहै।

Siddhanta Pada —

Verse 54 of 63

श्री बिशोक नंदिनी बिनु कौहै। हम से अधम ओर निरबाहक, यह जस और को सोहै॥ [1] जाकौ मन इन पद रस लाग्यौ, सो क्यों सकै इक छिन कवि छौहै। जय श्री बंसी अलि श्रीराधा जीवन धन, जाको बदन कुंवरि नित जौहै॥ [2] - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (37) श्री बिशोक नंदिनी बिनु कौहाई। जो दूसरों के बराबर है वही हमसे हीन या निर्भीक है.. [1] यदि वह इन छंदों में लीन हो गया तो लघु कवि क्यों नहीं बन सका? जय श्री बंसी अली श्रीराधा जीवन धन, जाको बदन कुंवारी नित जौहाई.. [2] - श्री बंसी अली, छंद के सिद्धांत (37)
आज सखि निरख रूप भरि नैनश्री ललिता सिखवत रस परिकर की ॥