श्री ललिता सिखवत रस परिकर की ॥

Siddhanta Pada —

Verse 55 of 63

श्री ललिता सिखवत रस परिकर की ॥ वृषभान पुरा को बास सखीरी, पूजी आसा मो मन की॥ [1] तुब पद पकंज सेऊं प्रेम सों, सुध न रहे कछु तन की। ब्रज रज लिपट रहों श्री बंसी अलि, मोह नाहिं धन गुन की॥ [2] - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (26) श्री ललिता ने मुझे प्रेम की शिक्षा दी... वृषभान पुरा तो सखा था, पूजित उतना ही मेरा मन... [1] टब पद पकंज स्यूं प्रेम पुत्र, सुध नहिं कुछु तन की। ब्रज रज पट रहो श्री बंसी अली, प्यार दौलत से नहीं पैसे से है.. [2] - श्री बंशी अली, उसूलों के उसूल (26)
श्री बिशोक नंदिनी बिनु कौहै।श्री वृन्दावन चन्द्र जू, महाप्रेम-सुख दानि।