आज सखि निरख रूप भरि नैन

Siddhanta Pada —

Verse 6 of 63

(राग विहागरौ) बनि दुकूल बैठे परजंक। कमल नैंन अंग छवि निरखत, प्यारी भरे जू अंक॥ [1] धन्य धन्य पिय मानि अपनपौ, ज्यौं निधि पाये रंक। श्रीरसिकबिहारी यह सुख विलसत, तहाँ निकट निसंक॥ [2] - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (17) (राग विहागरौ) बानी दुकुल बैठे परजंक। कमल नयनों की छवि अवर्णनीय, प्रेम से परिपूर्ण है। श्री रसिक बिहारी यह सुख विलास मुक्ति निकट.. [2] - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी के वचन, सिद्धांत के दोहे (17)
आज सखि निरख रूप भरि नैनभजि लै कुंज बिहारिनि बाल।