बिहारिनी संग निरंतर मेरें।

Siddhanta Pada —

Verse 8 of 63

बिहारिनी संग निरंतर मेरें। जाकी कृपा लाल रहें वंच्छित जीवत याहि हेरें॥ [1] निकसि न सकत रूप सागर तें परे प्रेम रस फेरें। ऐसी ललित किसोरी प्रीतम कहा जगत के डेरें॥ [2] - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (104) बिहारिणी के साथ निरंतर मेरेन। भगवान का आशीर्वाद यहां की निराश्रित आत्माओं के लिए लाल बना रहे.. [1] प्रेम भवसागर से पार नहीं हो सकता। ऐसे ललित किशोरी प्रीतम, कहां हैं जग के शिविर.. [2] - श्री ललित किशोरी देव के वचन, सिद्धांत, श्री ललित किशोरी देव जू (104)
भजि लै कुंज बिहारिनि बाल।चात्रिक ज्यौं घन चंद चकोर, विपिन विनोद विलोकि हिया। [1]