चात्रिक ज्यौं घन चंद चकोर, विपिन विनोद विलोकि हिया। [1]

Siddhanta Pada —

Verse 9 of 63

चात्रिक ज्यौं घन चंद चकोर, विपिन विनोद विलोकि हिया। [1] ज्यौं जल मीन जियत मकरंद, कौ पान करै अलि व्है कैं हिया॥ [2] दरसैं परसैं नित्यनागरीदास, प्रिया पिउ राखि हृदै मंहिया। [3] मनसा वाचा कुंजबिहारी बिना, गति आन अनन्यनि कै नहिया॥ [4] - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (29) चात्रिक घन चंद चकोर जैसा है,विपिन विनोद विलोकी है। [1]. [3] मनसा वाचा कुंजबिहारी बिना, गति अन अनन्यै कै नाहिया.. [4] - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, सिद्धांत श्लोक (29)
बिहारिनी संग निरंतर मेरें।दिन अथयौ संध्या भई, बोलन लागे मोर।