हम अहीरि कह जानईं जोग जुगुति की रीति

Sur Sagar — श्री सूरदास

Verse 14 of 92

हरि, तेरौ भजन कियौ न जाइ। कह करौ, तेरी प्रबल माया देति मन भरमाइ॥ [1] जवै आवौ, साधु-संगति कछुक मन ठहराइ। ज्यौ गयंद अन्हाइ सरिता, बहुरि वहै सुभाइ॥ [2] वेष धरि धरि हरयौ पर-धन, साधु-साधु कहाइ। जैसे नटवा लोभ-कारन, करत स्वाँग बनाइ॥ [3] करौ जतन, न भजौ, तुमकौं, कछुक मन उपजाइ। सूर प्रभु की सबल माया, देति मोहि भुलाइ॥ [4] - श्री सूरदास, सूर सागर हरि मैंने आपकी पूजा की है। कहो, तुम्हारी प्रबल माया मेरे मन को मोहित कर लेती है.. [1] चले जाओ, साधु की संगति से मुझे कोई विशेष सरोकार नहीं है। कहां है नदी की गंध, कहां है पानी की प्रचुरता.. [2] हरयौ परा-धन, साधु-साधु खाई। जैसे, रिश्तेदार लालच के कारण दिखावा करते हैं.. [3] पूरी कोशिश करो, मुझे मत भेजो, तुम मुझे अपना दिल थोड़े ही दोगे। सुर प्रभु की प्रबल माया, भूलो माया। [4] - श्री सूरदास, सूर सागर
हम अहीरि कह जानईं जोग जुगुति की रीतिहरिजन संग छिनक जो होई