हम अहीरि कह जानईं जोग जुगुति की रीति

Sur Sagar — श्री सूरदास

Verse 18 of 92

जब जब मुरली कान्ह बजावत। तब-तब राधा नाम उचारत, बारंबार रिझावत॥ [1] तुम रमनी वह रमन तुम्हारे, वैसेहिं मोहिं जनावत। मुरली भई सौति जो माई, तेरी टहल करावत॥ [2] वह दासी तुम हरि-अर्धांगिनि, यह मेरैं मन आवत। सूर प्रगट ताही सौं कहि-कहि, तुमकौं श्याम बुलावत॥ [3] - श्री सूरदास, सूर सागर जब भी मुरली गाता। बारम्बार राधा नाम का जाप करो। [1] आप खुश हैं, यही आपकी खुशी है, यही खूबसूरत है। मुरली भैया, मेरी ननद, मैं तुमसे खूब चुदवाती हूँ.. [2] वाह गुलाम, तुम तो मेरी अर्धांगिनी हो, यही मेरे दिल की चाहत है। कहीं से आवाज आती है, तुम मुझे श्याम कहकर बुलाओ। [3] - श्री सूरदास, सूर सागर
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