बलि बलि हौं कुँवरि राधिका

Sur Sagar — श्री सूरदास

Verse 3 of 92

(राग सारंग एवं विहागरौ) बलि बलि हौं कुँवरि राधिका नन्दसुवन जासों रति मानी। वे अतिचुर तुम चतुर-सिरोमनी प्रीति करी कैसे रहे छानी॥1॥ वे जो धरत तन कनक पीट पत सो तो सब तेरी गति ठानी। तें पुनि स्याम सहज यह सोभा अंबर मिस अपेन उर आनी॥2॥ पुलकित अङ्ग अब ही व्है आयो निरखि सुभग निज देह सयानी। 'सूर' सुजान सखी के बूझे प्रेम प्रकास भयो विहँसानी॥3॥ - श्री सूरदास जी, सूर सागर (राग सारंग एवन विहागरौ) बाली बाली हूं कुंवारी राधिका नंदसुवन जसों रति मणि। तुम बहुत चतुर और अनमोल हो, प्रीति कारी, जो बहुत क्रोधित हो जाती हो, मेरे प्रिय..1.. सोने और चांदी से लदी हुई सारी पृथ्वी तुम्हारे अधीन थी। तेन पुनि स्याम सहज या सोभा अनबर मि अपेन उर अणि..2..पुलकित अंग अब ही वा आयो निरखि शुभग निज देह सयानी। 'सूर' सुजन सखी की बुझी प्रेम ज्वाला हुई प्रचंड।।3।। - श्री सूरदास जी, सूर सागर
हम अहीरि कह जानईं जोग जुगुति की रीतिहम अहीरि कह जानईं जोग जुगुति की रीति