हम अहीरि कह जानईं जोग जुगुति की रीति
Sur Sagar — श्री सूरदास
Verse 20 of 92
जैसैं सुखहीं तन बढ़यौ, तैसैं तनहिं अनंग।
धूम बढ्यौ, लोचन खस्यौ, सखा न सूझ्यौ संग॥
- श्री सूरदास, सूर सागर
मानो खुशियाँ ही खुशियाँ मिलीं, और कुछ नहीं मिला। धूम बध्यौ, लोचन खासयौ, सखा न सूझयौ संग.. - श्री सूरदास, सूर सागर