खंजन नैन सुरंग रसमाते
Sur Sagar — श्री सूरदास
Verse 27 of 92
(राग विहागरौ)
खंजन नैन सुरंग रसमाते।
अतिसय चारु विमल, चंचल ये, पल-पिंजरा न समाते॥ [1]
बसे कहूँ सोइ, बात सखी, कहि रहैं इहाँ किहि नाते।
सोइ संज्ञा देखति औरासी, विकल उदास कलातैं॥ [2]
चालि चालि जात निकट स्रवननि के, सकि ताटंक फंदाते।
सूरदास अंजन-गुन अटके, नतरू कबै उड़िजाते॥ [3]
- श्री सूरदास, सूर सागर
(राग विहागरौ) खंजन नैन सुरंग रसमते। चारु विमल बहुत मददगार है, चंचल है, पिंजरे में फिट नहीं बैठती। [1] कहां सोऊं, पर मित्र तुम यहीं कहीं ठहरे हो। सोती हुई स्नजन्या परेशानी और उदासी से दूसरी ओर देख रही थी.. [2] जैसे ही वह श्रावणी के करीब पहुंची, साकी अचानक फड़फड़ा रही थी। सूरदास अजना-गुण अतके, नटरु कबै उगते। [3] - श्री सूरदास, सूर सागर