लोचन भए स्याम के चेरे

Sur Sagar — श्री सूरदास

Verse 28 of 92

(राग रामकली) लोचन भए स्याम के चेरे। ऐते पै सुख पावत कोटिक, मोतन फेरि न हेरे॥ [1] हाहा करत परत हरि चरननि, ऐसे बस भए उन्हीं। उनको बदन विलोकत निसि-दिन, मेरौ कह्यो न सुनहीं॥ [2] ललित त्रिभंगी छवि पर अटके, फटके मोसौं तोरी। 'सूर' दसा यह मेरी कीन्ही, आपुन हरि सौं जोरि॥ [3] - श्री सूरदास, सूर सागर (राग रामकली) लोचन भये स्याम के चेरे। नित-दिन खुशियों की झोली, यहाँ कोई मोटन परी नहीं.. [1] हाँ, पर हरि के चरण, उनको तो यही भाते हैं। उनको बदन विलोकत निसि-दिन, मेरौ कहायो न सुनहिं.. [2] अतके, फटके मोसौं तोरी पर ललित त्रिभंगी छवि। 'सूर' दासा ये मेरी किन्ही, अपुन हरि सौं जोरी.. [3] - श्री सूरदास, सूर सागर
खंजन नैन सुरंग रसमातेमन रे श्याम सों कर हेत