हम अहीरि कह जानईं जोग जुगुति की रीति

Sur Sagar — श्री सूरदास

Verse 30 of 92

मीन वियोग न सहि सकै, नीर न पूछै बात। देखि जु तू ताकी गतिहि, रति न घटै तन जात॥ - श्री सूरदास, सूर सागर मैं अपने अलगाव को ठीक नहीं कर सका, मैं कुछ भी नहीं मांग सका। देखि जू तू ताकी गतिही, रति न घटै तन जात.. - श्री सूरदास, सूर सागर
मन रे श्याम सों कर हेतमेरी सुधि लीजौ हो, ब्रजराज