हम अहीरि कह जानईं जोग जुगुति की रीति

Sur Sagar — श्री सूरदास

Verse 40 of 92

प्रीति की रीति को पैंड़ो ही न्यारो॥ [1] कै जानत वृषभानुनंदिनी, कै जानत यह कान्हर कारो। [2] सहजे प्रीति न होय सखी री, यह अपने मन सोच विचारों॥ [3] प्रेम पंथ को तो चलन बांकुरों, रसिक बिना को समझन वारो। [4] सूरदास यह प्रीति कठिन है, सीस दिये भी न होत निवारो॥ [5] - श्री सूरदास, सूर सागर प्रेम की संस्कृति पर चोट मत करो.. [1] वृषभानुनंदिनी कौन जानता है, कौन जानता है, इसका त्याग करो। [2] प्यार प्राकृतिक नहीं है मेरे दोस्त, ये हमारे अपने मन के विचार हैं.. [3] ये बात वही समझते हैं जो प्यार का धर्म निभाते हैं, जो रोमांटिक होते हैं। [4] सूरदास, दीपक जलने पर भी यह प्रेम नहीं रुकता.. [5] - श्री सूरदास, सूर सागर
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