राधे तेरौ बदन बिराजत नीकौ

Sur Sagar — श्री सूरदास

Verse 45 of 92

(राग धनाश्री) राधे तेरौ बदन बिराजत नीकौ। जब तू इत-उत बंक बिलोकति, होत निसा-पति फीकौ॥ [1] भृकुटी धनुष, नैन सर, साँधे, सिर केसरि कौ टीकौ। मनु घूँघट-पट मैं दुरि बैठ्यौ, पारधि रति-पतिही कौ॥ [2] गति मैमंत नाग ज्यौं नागरि, करे कहति हौं लीकौ। सूरदास-प्रभु बिबिध भाँति करि, मन रिझयौ हरि पो कौ॥ [3] - श्री सूरदास, सूर सागर, राधा-कृष्ण (30) (राग धनाश्री) राधे तेरौ बदन बिराजत निकौ। जब तू इता-उत बैंक बिलोकति, होत निसा-पति फिकौ.. [1] भृकुटि झुक नयन सर संधे, सर केसर कौ टिकौ। घूंघट में तू दूर दूर बैठ मनु, तू पति से घिरी है.. [2] गति ममंत नाग जी नगर, मैं ऐसा क्यों कहूँ। सूरदास-प्रभु भिन्न-भिन्न प्रकार से काम करते हैं, मुझ पर दया करो.. [3] - श्री सूरदास, सूर सागर, राधा-कृष्ण (30)
राधे जु के प्रान गोवर्धन धारीयह सब जानों भक्त के लच्छन