यह सब जानों भक्त के लच्छन
Sur Sagar — श्री सूरदास
Verse 46 of 92
(राग नट)
राधे तू दधिसुत क्यों न दुरावे।
सुन सुन्दर वृषभानु नंदनी काहेको मन तरसावै॥ [1]
सारंग दुःखी होत सारंग बिन तोहि दया नहीं आवे।
जलसुत दुःखी दुःखी वे मधुकर द्वयपंछी दुःखी पावै॥ [2]
सारंग रिपु की नेंक ओट कर जो सारंग सचुपावै।
सूरदास सारंग के धोखे सारंग कुलहि लजावे॥ [3]
- श्री सूरदास, सूर सागर
(राग नट) राधे, तुम मुझे ऐसा करने से क्यों नहीं रोकते। सुन सुन्दर वृषभानु नन्दनी, मन क्यों तरसता है? [1] सारंग सारंग के बिना दुखी है इसलिए उसे दया नहीं आती। जलसुत दु:खहि दु:खि वे मधुकर द्वयपञ्चि दु:खि पावै।।[2] सारंग सचुपावै जो भर दे सारंग से रिपु की नयन। सूरदास सारंग का छल, सारंग कुलहि लाजावे.. [3] - श्री सूरदास, सूर सागर