हम अहीरि कह जानईं जोग जुगुति की रीति
Sur Sagar — श्री सूरदास
Verse 49 of 92
सदा एक रस अखंडित, आदि अनादि अनूप।
कोटि कल्प बीतत नहीं जानत, विहरत जुगल स्वरूप॥
- श्री सूरदास, सूर सागर
सदा एक स्वाद, अखण्ड, सदा अनोखा। कौन जाने करोड़ों कल्प बीत गए, जुगल बने फिरते हैं.. - श्री सूरदास, सूर सागर